Thursday, December 31, 2009

जाने कहाँ गए वोह दिन............

ज़िन्दगी भी पता नहीं कैसे मोड़ लेती है, पता ही नहीं चला कब बड़े हो गए और कब वक़्त गुजर गया/ वो वक़्त भी क्या था जब चंदामामा की चांदनी में माँ की हांथों से निवाला खाते थे और अब एक वक़्त ऐसा है जब खाना खाने तक ही फुरसत नहीं मिलती/ अपने बचपन के चंदामामा से मिलना तो जैसे सपना हो गया हो/ पता ही नहीं चला कब ज़िन्दगी के इस भागम भाग में इतना खो गए की अपने ही ज़िन्दगी के छोटी छोटी खुशिया हमसे दूर होने लगे/ सूरज का डूबना और चाँद का उभारना तोह पता ही नहीं चलता और दिन कब रात में बदल गयी यह भी तोह नहीं दीखता/ न सूरज का उभारना जानते है न दिन का ढलना/ ज़िन्दगी के इस हेरा फेरी में कुछ ऐसे खो गए है की ज़िन्दगी के उन हसींन लम्हों को जीना तोह चाहते है पर वक्त नहीं रहता/ ऐसी ज़िन्दगी ही क्या जो हम अपने लिए अपने दिल को खुश करने के लिए वक्त ही न निकाल पाए? एक पूर्णिमा की रात जब घर से बाहर कुछ काम से जाना पडा तब चाँद की चांदनी ने मन को कुछ ऐसे मोह लिया की नज़र हटाये न हट सकी/ उस रात एक अजीब सी खुशी का एहसास किया/ वोह ख़ुशी जो बचपन के हर रात को सुहाना कर देती थी आज बड़े अर्जे के बाद महसूस कर रही थी/ शायद यही ज़िन्दगी का नियम है खुशी तोह देती है पर लम्बे अर्जे के लिए नहीं/  हर पल यह एहसास तोह कराती है की हमारे इस ज़िन्दगी में खुशियाँ तोह है पर उनका आनंद उठाने का वक्त नहीं/ एक पल ज़िन्दगी में ऐसा था जब चाँद की चांदनी और तारों की सुन्दरता सारे दुःख हर लेती थी और सुकून की नींद सुलाती थी और अब एक वक्त ऐसा है जहाँ हर रात बिना नींद के गुज़र जाती है पर अपने उन रात के साथी दुःख हरता की याद ही नहीं आती/ ज़िन्दगी के इस भागम भाग ने हम से सब कुछ चीन लिया हमारे साथी, छोटी छोटी खुशिया पर फिर भी हम कुछ नहीं कर पाते/ क्या यही ज़िन्दगी है? शायद हाँ या शायद ना पर वक्त तोह जुज़र्ता रहता है और ज़िन्दगी भी तेजी से आगे बढती रहती है यह ना सोचते की हम उस रफ़्तार से आगे बढ़ भी रहे है या नहीं? काश वोह बचपन हमे कुछ पल के लिए लौटा दिया जाए ताकि हम इस पल के सारे दुःख उस चंद लम्हों में भूल जाए और फिर इस ज़िन्दगी के हेरा फेरी में लौट आये............काश ऐसा हो पाता/काश.....................


-स्नेहा