Monday, May 31, 2010

क्या जीना इसी का नाम है????

हवा के बदलते रूह के साथ ज़िन्दगी भी अपने रास्तें बदलती है, हर राह नया हर मंजिल नयी और अन्जान/ हर सफ़र में नए लोग मिलें कुछ ज़िन्दगी से जुड़ ते गए और कुछ ऐसा ज़ख्म छोड़ गए की उन्हें भुलाने की हर कोशिश उन ज़ख्मों को गहरा करती गयी............... फिर भी  हर  मोड़ पर अल्विदा कहना इतना मुश्किल हो जाता है की हम उन दुःख देने वालों से बिचादते भी घबराते है, चाहते है कि  उन पलों को कैद कर ले, उन्हें जाने ना दे............


ऐसा क्यों होता है की ज़िन्दगी में कुछ लोगों का साथ पा  कर भी हम उन्से दूर हो जाते है? और उन्हें एहसास भी नहीं होता की वो कितना गहरा ज़ख्म छोड़ जा रहे है................


हर घम  को भुलाना, आगे बढ़ना इतना मुश्किल हो जाता है की उन्से दूर  भागना  भी  नामुम्किन लगने लगता है..............
क्या जीना इसी का नाम है??????


स्नेहा.......