Tuesday, May 29, 2012



आसमान की परी 


 आशियाना ढूँढती हुई
आ पहुंची हूँ किसी घरोंदे में
ज़िन्दगी की तलाश में भटकती
सन्नाटे की आह में सिसकती
दर्द की आवाज़ है गूंजती मेरी कानों में
उड़ने कि चाह लिए निकल पड़ी थी
पंख है फडफडाते, थक चुके हार चुके
पर ना मिला मेरा कोई आशियाना
आसमान में ही हूँ फिर भी मंजिल दूर है
उन्से क्या कहे जो मेरे साथ उड़ना चाहते है
फिर भी कहते है मुझे आसमान की परी........:)

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