Thursday, November 1, 2012

ख्वाइश .......

आया मन में एक अजीब ख्याल ,
था अपने आप से एक सवाल /

खयालो को मिल गया एक ज़रिया ,
कागज़ बन गया मेरा सहारा /


मनुष्य का रूप जो है लिया ,

दिल को है तनहा पाया ,
आसुओं को है अपनाया, 
क्या येही है मानव रूप की माया?

अगर में कलम होती ,
कवी के हाथों में शोभा देती /

अगर कागज़ होती 
बच्चे की हात में नाँव बनके ख़ुशी बटोरती 

अगर फूल होती ,
चंद पल के जीवन में कई दिल लुभाती /

अगर कोई खिलौना होती ,
खेलने वाले की मासोमिअत में खो जाती /

अगर बरसात के रूप में बहती ,
कई दिलों की तन्हाई की साथी बनती/ 

अगर होती कोई परिंदा,
उड़ जाती कहके सबको अल्विदा/ 

लेकिन मानव रूप मैं क्या है मैंने पाया??
टूटे ख्वाबोँ को पूरा करने का है कोई ज़रिया ???

में तो चाहू कलि से भूल बनू ,
चन्द पलों की ज़िन्दगी में दिलों में प्यार भरूं /

कुछ और तो न चाहू ,
चंद  पल जीयु और मुर्झाऊ ,
दिल की सुकून अपने साथ ले जाऊ /

ख्वाइशों से भरा ये बावरा मन,
ना अपनाना चाहे ये जीवन.........

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