Saturday, May 16, 2015


शादी 

तंग आ गयी हूँ सुनके ये शादी का नारा 
क्या शादी ही है मेरी ज़िन्दगी का सहारा 

कौन बता सकता है शादी के लिए सही उम्र 
कुछ और दिन अकेली रहना चाहती हूँ, क्या है कोई जुर्म?

हर दिन कोई ना कोई ले आता है नया रिश्ता 
क्यों नहीं समझते मेरा दिल भी है इसमें पिस्ता 

शादी.......... इस रिश्ते को निभाने चाहिए मुझे हिम्मत और होसला 
क्यों कर रहे हो जल्दबाज़ी लेने ये एहम फैसला 

क्यों हर किसी को है मेरी ज़िन्दगी की फ़िक्र 
ऐसी फ़िक्र जिसमे नहीं आता कही मेरा ज़िक्र 

इन कई नये रिश्तों को निभाने नहीं हूँ मैं तैयार 
करो मेरे भी फैसले का कुछ तो करार 

हर वक़्त शादी रिश्तों का क्यों खोल कर बैठते हो किताब  
शादी नहीं है मेरे इत्छाओं का जवाब 

सच्चे दिल से करना चाहती हूँ इस रिश्तें का दीदार 
दे दो मुझे थोड़ा वक़्त, कर सकू  अपने आप को तैयार 

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