Thursday, December 7, 2017

दिनों को गिनते गिनते गुज़र गए साल
आज भी क्यों बीतें यादें मचाये दिल में बवाल 

क्यों याद आते है वो आज भी जिनसे जुड़ा है बस घम 
क्यों आँखें आज भी हो जाती है नम 

हमारा मिलना शायद था संजोग 
साथ रहना शायद नहीं था हमारा योग 

वक़्त के साथ दर्द सहने की भी पद जाती है आदत 
पर उन पलों का क्या जिन्हे हमने माना था इबादत 

ये दिल का दर्द नहीं समझ पायेगा कोई 
आज भी है छुप छुप के ये आँखें रोई 

कुछ और भी बनालु में अपनी पहचान 
दिल पे रह जायेंगे उस दर्द के निशाँ 



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