दिनों को गिनते गिनते गुज़र गए साल
आज भी क्यों बीतें यादें मचाये दिल में बवाल
क्यों याद आते है वो आज भी जिनसे जुड़ा है बस घम
क्यों आँखें आज भी हो जाती है नम
हमारा मिलना शायद था संजोग
साथ रहना शायद नहीं था हमारा योग
वक़्त के साथ दर्द सहने की भी पद जाती है आदत
पर उन पलों का क्या जिन्हे हमने माना था इबादत
ये दिल का दर्द नहीं समझ पायेगा कोई
आज भी है छुप छुप के ये आँखें रोई
दिल पे रह जायेंगे उस दर्द के निशाँ
No comments:
Post a Comment