Saturday, October 22, 2011

ज़िन्दगी का सफ़र

सुहाना था बचपन हमारा,
था सभी का प्यार और सहारा/

जब दिखी हमारे चेहरे पे पहली हँसी,
खिल गयी सबके दिलों में ख़ुशी/

जिस खिलोने से हम ने खेला, 
वो बन गया अन्मोल सोना/

जब हम ने अपना पहला कदम लिया,
उन्हें लगा हम ने दुनिया जीत लिया/

माँ की लोरी और पापा का गुस्सा,
थी ख़ुशी ज़िन्दगी का हिस्सा/

अब ज़िन्दगी के हर कदम पर मजबूर रह गए,
किसी की ख़ुशी के लिए खुद दुःख सह गए/

इस छोटी सी ज़िन्दगी में जाने कहाँ खो गए,
हर लम्हा खुद ही को ढूँढ़ते रह गए/

थी वो दुनिया हमारी जहाँ दिल खुश था,
अब ये है दुनिया हमारी जहाँ दिल खुश हो नहीं पाता/

क्यों हम बड़े  हो गए,
सबके साथ रहते भी अकेले हो गए/

स्नेहा 

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