आज उत्तराखंड कल क्या??
जा रहे थे यात्री करते भगवन की उपासना
फिर क्यों आन पड़ी उन पर ये विनाशना
हर जगह दिखे बस लाशों की ढेर
कहीं दूर घर पर इंतज़ार करने वालो को दिखे बस अंधेर
माँ पापा कौन है ना जाने वो बच्चे
क्यों आई उनपे ये विपत्ति जो है इतने सच्चे
हम ही ने शुरू की है प्राकृतिक विपत्ति का व्यंजन
बढती आबादी, जंगल का विनाश इसका कारण
प्रकृति का संतुलन जो है बिगड़ा
प्रकोप भी दिखे है तगड़ा
फिर भी सुनने मिले है, कोई बचाने चले है सिर्फ गुजराती
क्या ऐसे हालात में पता चले है किसी की जाती??
देश के सेना की बता सकते हो जात??
क्यों नहीं कर सकते इंसानियत की बात??
इसमें भी राजकीय नेता ढूंढ रहे है मतलब
ना बनाओ इसे चुनाव जीतने का कोई करतब
आन पान से जैसे नाता हो गया है चूर
आँखें ढूंढे अपनों को दूर दूर
समझो उनकी लाचारी
उठाओ कुछ तो ज़िम्मेदारी
साथ मिल झूझना है हमे हालात
बढाओ सहायता का हात
करो आज सब एक प्रण
प्रकृति का करते है पुनः निर्माण
आज अगर प्रकृति से ये हमने न सीखी
तो शायद कल अपनी ही ज़िन्दगी पड़ जाएगी फीकी
जा रहे थे यात्री करते भगवन की उपासना
फिर क्यों आन पड़ी उन पर ये विनाशना
हर जगह दिखे बस लाशों की ढेर
कहीं दूर घर पर इंतज़ार करने वालो को दिखे बस अंधेर
माँ पापा कौन है ना जाने वो बच्चे
क्यों आई उनपे ये विपत्ति जो है इतने सच्चे
हम ही ने शुरू की है प्राकृतिक विपत्ति का व्यंजन
बढती आबादी, जंगल का विनाश इसका कारण
प्रकृति का संतुलन जो है बिगड़ा
प्रकोप भी दिखे है तगड़ा
फिर भी सुनने मिले है, कोई बचाने चले है सिर्फ गुजराती
क्या ऐसे हालात में पता चले है किसी की जाती??
देश के सेना की बता सकते हो जात??
क्यों नहीं कर सकते इंसानियत की बात??
इसमें भी राजकीय नेता ढूंढ रहे है मतलब
ना बनाओ इसे चुनाव जीतने का कोई करतब
आन पान से जैसे नाता हो गया है चूर
आँखें ढूंढे अपनों को दूर दूर
समझो उनकी लाचारी
उठाओ कुछ तो ज़िम्मेदारी
साथ मिल झूझना है हमे हालात
बढाओ सहायता का हात
करो आज सब एक प्रण
प्रकृति का करते है पुनः निर्माण
आज अगर प्रकृति से ये हमने न सीखी
तो शायद कल अपनी ही ज़िन्दगी पड़ जाएगी फीकी
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